ईरान पर अमेरिकी हमला: Trump ने खार्ग आइलैंड पर कब्जे की धमकी दी

वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बृहस्पतिवार को सोशल मीडिया पर एक सीधा संदेश पोस्ट किया और दुनिया को हिला दिया। उन्होंने लिखा कि अमेरिका आज रात ईरान पर “बहुत ज़ोरदार तरीके” से हमला करेगा। साथ ही यह भी ऐलान किया कि आने वाले समय में अमेरिका खार्ग आइलैंड और ईरान के दूसरे तेल-गैस ठिकानों पर पूरी तरह काबिज़ हो जाएगा।

यह बयान तब आया जब अमेरिका और ईरान के बीच लगातार दूसरे दिन हमले और जवाबी हमले का सिलसिला चल रहा था।

बुधवार की रात अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान में “कई ठिकानों” पर हमले की पुष्टि की। ट्रंप ने खुद Fox News को बताया कि इस दौर में 49 टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं। ये हमले बंदर अब्बास, सिरिक और मिनाब जैसे दक्षिणी ईरानी शहरों के पास हुए।

ईरान ने तुरंत पलटवार किया। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड ने बहरीन, जॉर्डन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। कुवैत की सेना ने कुछ मिसाइलें रोकीं, जबकि जॉर्डन में रह रहे अमेरिकियों को तत्काल सुरक्षित स्थान पर जाने की चेतावनी दी गई।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने अपने बयान में कहा कि ये हमले ईरान की “बेजा और निरंतर आक्रामकता” के जवाब में किए गए।

खार्ग आइलैंड

फारस की खाड़ी में बसा खार्ग आइलैंड मात्र पाँच मील लंबा एक छोटा-सा टापू है। लेकिन इसकी अहमियत उसके आकार से कहीं बड़ी है। ईरान का करीब 90 फीसद कच्चा तेल इसी द्वीप से होकर निर्यात होता है, और रोज़ाना करीब 15 लाख बैरल तेल यहाँ से निकलता है। यही वजह है कि इसे ईरान की तेल अर्थव्यवस्था का दिल कहा जाता है।

इस द्वीप पर लंबे घाट बने हैं जहाँ विशालकाय तेल टैंकर आसानी से रुक सकते हैं। ये टैंकर खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होते हुए चीन और दूसरे एशियाई बाज़ारों तक तेल पहुँचाते हैं। ट्रंप ने कहा है कि जिस तरह अमेरिका ने वेनेज़ुएला के तेल बाज़ार पर पकड़ बनाई है, उसी तरह वे ईरान के तेल और गैस बाज़ार पर भी “पूरा नियंत्रण” करेंगे।

सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि खार्ग आइलैंड को नुकसान पहुँचने का मतलब होगा ईरानी अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ देना।

यह टकराव अचानक नहीं हुआ। फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से करीब 900 हमले सिर्फ 12 घंटों में किए जिनमें ईरानी मिसाइलें, हवाई रक्षा प्रणालियाँ और सैन्य बुनियादी ढांचा तबाह किया गया। उसके बाद से दोनों देशों के बीच रुक-रुककर हमले और जवाबी हमले होते रहे हैं।

ट्रंप का कहना है कि ईरान शांति वार्ता को जानबूझकर लंबा खींच रहा है। अप्रैल 2026 में अमेरिका ने खार्ग आइलैंड पर सैन्य ठिकानों पर हमला किया था, हालाँकि उस बार तेल के बुनियादी ढांचे को निशाना नहीं बनाया गया।

ताज़ा दौर की शुरुआत एक अमेरिकी Apache हेलीकॉप्टर के होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास गिरने की घटना के बाद हुई। इसे लेकर दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए।

अमेरिकी रक्षा मंत्री ने मार्च 2026 में एक कैबिनेट बैठक में कहा था कि अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमता को “इतनी तेज़ी और प्रभावशाली ढंग से” नष्ट किया है जैसा पहले कभी नहीं हुआ। लेकिन ईरान ने उसके अगले ही दिन सऊदी अरब स्थित अमेरिकी अड्डे पर हमला करके 700 मिलियन डॉलर का राडार विमान नष्ट कर दिया।

वेनेज़ुएला मॉडल

ट्रंप के बयान में वेनेज़ुएला का ज़िक्र खास मायने रखता है। अमेरिका ने वेनेज़ुएला के तेल क्षेत्र पर जिस तरह दबाव बनाया और नियंत्रण हासिल किया, ट्रंप उसे एक “शानदार सफलता” की तरह पेश करते हैं। अब वे वही फॉर्मूला ईरान पर लागू करने की बात कर रहे हैं।

इस रणनीति के दो हिस्से साफ दिखते हैं। पहला, ईरान की सैन्य ताकत को पहले खत्म करो। दूसरा, उसके बाद उसके ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण लो। ट्रंप ने कहा है कि ईरान की नौसेना, वायु सेना, रडार और हवाई रक्षा प्रणाली “पूरी तरह नष्ट हो चुकी है।” हालाँकि ईरान इन दावों को खारिज करता है।

ईरान ने साफ कहा है कि वह अमेरिकी दबाव में घुटने नहीं टेकेगा। तेहरान के अनुसार, वाशिंगटन न तो सीरियस बातचीत में रुचि रखता है और न ही किसी संघर्षविराम में। ईरान ने यह भी कहा है कि वह राजनयिक संपर्क पर “पुनर्विचार” कर रहा है।

ISW (Institute for the Study of War) के विश्लेषणकर्ताओं के अनुसार, “ईरानी शासन अमेरिका से रियायतें लेने के लिए सुनियोजित बल-प्रयोग की कोशिश कर रहा है।”

भारत के नज़रिए से भी यह संकट गंभीर है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से भारत के तेल आयात का बड़ा हिस्सा गुज़रता है। अगर यह जलमार्ग बाधित हुआ तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा।

11 जून 2026 की रात अमेरिका के और हमलों के बाद दुनिया की नज़रें अब दो सवालों पर टिकी हैं। पहला, क्या ईरान वाकई बातचीत की मेज़ पर वापस आएगा? दूसरा, क्या ट्रंप खार्ग आइलैंड के तेल बुनियादी ढांचे को सीधे निशाना बनाएंगे?

अगर खार्ग आइलैंड पर हमला होता है तो वैश्विक तेल बाज़ार में भूचाल आ सकता है। दुनिया का करीब 20 फीसद तेल होर्मुज़ से होकर गुज़रता है। इस इलाके में किसी भी बड़े टकराव का असर भारत, चीन और यूरोप — सभी पर पड़ेगा। फिलहाल संघर्षविराम की कोई ठोस संभावना नहीं दिखती और मध्य-पूर्व एक बार फिर एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ा है।


अमेरिका ने ईरान पर हमला क्यों किया?

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि ईरान शांति वार्ता को जानबूझकर लंबा खींच रहा है और लगातार आक्रामक रवैया अपना रहा है। अमेरिकी सेना ने इन हमलों को ईरान की “बेजा और निरंतर आक्रामकता” का जवाब बताया है।

खार्ग आइलैंड इतना ज़रूरी क्यों है?

खार्ग आइलैंड ईरान के करीब 90 फीसद कच्चे तेल के निर्यात का केंद्र है। रोज़ाना लगभग 15 लाख बैरल तेल इसी द्वीप से निकलता है। इस पर कब्ज़ा या नुकसान का मतलब होगा ईरानी अर्थव्यवस्था को लगभग पूरी तरह ठप कर देना।

क्या ईरान के पास अब कोई सैन्य ताकत बची है?

ट्रंप का दावा है कि ईरान की नौसेना, वायु सेना, रडार और हवाई रक्षा प्रणाली नष्ट हो चुकी है। लेकिन ईरान ने बहरीन, जॉर्डन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले किए हैं, जिससे यह साफ है कि उसकी कुछ मारक क्षमता अभी भी बाकी है।

इस युद्ध का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत अपने तेल का बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से मँगाता है। अगर यह जलमार्ग बंद हुआ तो भारत में तेल के दाम बढ़ सकते हैं और आर्थिक संकट भी गहरा हो सकता है।

अमेरिका-ईरान यह युद्ध कब शुरू हुआ?

इस संघर्ष की शुरुआत फरवरी 2026 के अंत में हुई जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर 12 घंटों में करीब 900 हमले किए। तब से दोनों देशों के बीच रुक-रुककर तनाव बढ़ता रहा है।

Trump Iran ceasefire deal पर सियासी भूचाल और कूटनीतिक उम्मीदें

Trump Iran ceasefire deal वार्ताएँ एक बेहद नाज़ुक मोड़ पर पहुँच गई हैं, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से अपने वार्ताकारों को निर्देश दिया है कि वे “किसी भी समझौते में जल्दबाज़ी” न करें, जबकि वॉशिंगटन और तेहरान दोनों ही यह संकेत दे रहे हैं कि एक डील क़रीब है। यह सतर्क संदेश उस बयान के सिर्फ़ एक दिन बाद आया, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि एक समझौता “ज़्यादातर तैयार” हो चुका है, जिससे यह अटकलें तेज़ हो गईं कि किसी भी समय औपचारिक घोषणा हो सकती है। यह नया ठहराव उस नाज़ुक कूटनीति में अनिश्चितता का नया तत्व जोड़ता है, जिसका मक़सद युद्ध रोकना, होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण के लिए ढांचा तैयार करना है।

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अमेरिकी और क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उभरती हुई Trump Iran ceasefire deal का केंद्र मौजूदा युद्धविराम को अतिरिक्त 60 दिन के लिए बढ़ाना है, जिसके साथ अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य को चरणबद्ध तरीके से फिर से खोलने के कदम भी जुड़े हैं। इस फ़्रेमवर्क में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी को सीमित या आंशिक रूप से हटाने की बात भी कही जा रही है, जिसका इस्तेमाल वॉशिंगटन अप्रैल की शुरुआत से तेहरान पर दबाव बढ़ाने के लिए कर रहा है। इसके बदले में ईरान होर्मुज़ से गुजरने वाले तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही को धीरे–धीरे सामान्य करेगा, जिस पर उसका प्रभावी नियंत्रण रहा है और जिसे बंद या काफ़ी हद तक सीमित करने से वैश्विक बाज़ार में तेल की क़ीमतें ऊपर चली गई हैं।

कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, इस पैकेज में यह संभावना भी शामिल है कि तेहरान अपने उच्च–समृद्ध यूरेनियम के स्टॉक का बड़ा हिस्सा या तो सौंप देगा या उसे कम स्तर पर पतला कर देगा, और इसका एक हिस्सा किसी तीसरे देश—जैसे रूस—को भेजा जा सकता है। माना जाता है कि ईरान के पास सैकड़ों किलोग्राम उच्च–समृद्ध यूरेनियम है, जिसका उपयोग परमाणु ऊर्जा के साथ–साथ, पर्याप्त स्तर पर समृद्ध होने पर, हथियारों के लिए भी किया जा सकता है। उम्मीद की जा रही है कि इस स्टॉक के निपटान और भविष्य के परमाणु प्रतिबंधों की बारीकियों पर बातचीत 60 दिन के युद्धविराम के दौरान और उसके बाद भी जारी रहेगी।

ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखे एक पोस्ट में ज़ोर दिया कि बातचीत “व्यवस्थित और रचनात्मक” ढंग से आगे बढ़ रही है, लेकिन साथ ही यह दावा किया कि “समय हमारे पक्ष में है” और दोनों पक्षों को “समय लेकर सब कुछ सही करना चाहिए।” उन्होंने Trump Iran ceasefire deal को इतना महत्वपूर्ण बताया कि इसे जल्दबाज़ी में अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता, और चेतावनी दी कि किसी भी अंतिम समझौते या मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (MoU) में “कोई गलती की गुंजाइश नहीं” है। राष्ट्रपति ने यह भी दोहराया कि ईरान को “यह समझना होगा” कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं कर सकता—यह वह लाल रेखा है जिस पर वे खुद, इज़राइल और पश्चिमी सहयोगी पहले से सहमत हैं।

इसके समानांतर, ट्रंप ने ईरानी बंदरगाहों पर लागू अमेरिकी नाकाबंदी को भी अपनी leverage के रूप में बनाये रखा है और साफ़ किया कि किसी भी समझौते के “हस्ताक्षरित और प्रमाणित” होने तक यह नाकाबंदी “पूरी ताक़त से लागू” रहेगी। यह दोहरी रणनीति उन्हें घरेलू सख़्तपंथियों को यह भरोसा दिलाने का अवसर देती है कि दबाव बरक़रार है, जबकि दुनिया को यह संकेत भी जाता है कि अमेरिका युद्ध से निकलने के लिए एक बातचीत–आधारित रास्ते के लिए तैयार है।

Trump Iran ceasefire deal ने रिपब्लिकन पार्टी के भीतर गहरे मतभेद को भी उजागर कर दिया है, ख़ासकर उन नेताओं के बीच जो ईरान पर वर्षों से बेहद सख़्त रुख़ अपनाने की वकालत करते रहे हैं। सीनेटर टेड क्रूज़ ने चेतावनी दी है कि कोई भी ऐसी डील, जो ईरानी शासन को सत्ता में रहने दे और उसके बदले उसे प्रतिबंधों में राहत तथा यूरेनियम संवर्धन की कुछ गुंजाइश दे, “बहुत बड़ी गलती” होगी। सीनेट आर्म्ड सर्विसेज़ कमेटी के चेयरमैन रोजर विकर ने भी 60 दिन के युद्धविराम पर आपत्ति जताई और कहा कि इससे “ऑपरेशन एपिक फ़्यूरी की सारी उपलब्धियाँ बेकार हो जाएँगी।”

हालाँकि पार्टी के भीतर सभी सुर एक–जैसे नहीं हैं। प्रतिनिधि सभा के सदस्य माइक लॉरलर का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने “इस शासन के बचे–खुचे ढाँचे को असल बातचीत की मेज़ पर लाने” में सफलता पाई है, और इसे वे रणनीतिक उपलब्धि के रूप में देखते हैं, न कि रियायत के रूप में। यह आंतरिक खींचतान तय करेगी कि अगर कोई अंतिम समझौता सामने आता है तो कांग्रेस में उसका स्वागत कैसे होगा और उसकी राजनीतिक मजबूती कितनी होगी।

ईरानी नेतृत्व की तरफ़ से भी यह स्वीकार किया गया है कि बातचीत में प्रगति हुई है, लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि अभी “एक–दो” अहम मुद्दों पर मतभेद बरक़रार हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बघाई ने ज़ोर देकर कहा कि कई बिंदुओं पर दूरी कम होना, अपने–आप में यह गारंटी नहीं देता कि तेज़तर्रार मुद्दों—जैसे प्रतिबंधों में राहत और परमाणु सीमाएँ—पर भी सहमति बन जाएगी। ईरान से जुड़ी कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्तावित MoU की कुछ धाराओं पर अभी भी बारीक शब्दों और क़ानूनी भाषा को लेकर असहमति है।

तेहरान साफ़ कर चुका है कि किसी भी Trump Iran ceasefire deal में उसके जमे हुए विदेशी फ़ंड्स का आंशिक रिलीज़ और तेल निर्यात पर असर डालने वाले प्रमुख प्रतिबंधों में कुछ ठोस नरमी शामिल होनी चाहिए। ईरानी अधिकारी संकेत दे चुके हैं कि युद्धविराम और होर्मुज़ से जुड़े व्यावहारिक इंतज़ाम अपेक्षाकृत तेज़ी से तय हो सकते हैं, लेकिन परमाणु कार्यक्रम और व्यापक प्रतिबंध–नीति पर समझौता करने के लिए अतिरिक्त दौरों और लंबी बातचीत की ज़रूरत होगी।

होर्मुज़ जलडमरूमध्य की अहमियत यह समझाती है कि Trump Iran ceasefire deal पर पूरी दुनिया की नज़र क्यों टिकी हुई है। फरवरी के अंत में अमेरिका–इज़राइल के व्यापक हमलों के बाद, और फिर ईरान की जवाबी कार्रवाई के साथ, तेहरान ने होर्मुज़ पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल शिपिंग को काफ़ी हद तक सीमित करने में किया, जिससे तेल की क़ीमतें चढ़ गईं और वैश्विक बाज़ारों में घबराहट फैल गई। अप्रैल में हुआ युद्धविराम ज़्यादातर बना हुआ है, लेकिन यह जलडमरूमध्य अभी भी बेहद संवेदनशील है और छोटे–मोटे टकरावों की वजह से भी अस्थिर हो सकता है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि होर्मुज़ के मसले पर “महत्वपूर्ण, लेकिन अंतिम नहीं” प्रगति हुई है, और आने वाले दिनों में “पूरी तरह खुला जलडमरूमध्य…बिना किसी टोल” जैसी स्थिति बन सकती है। ईरानी मीडिया भी संकेत दे रही है कि अगर MoU पर सहमति बन जाती है, तो कुछ ही हफ़्तों में शिपिंग वॉल्यूम युद्ध से पहले के स्तर के क़रीब पहुँच सकते हैं। यूरोप से लेकर एशिया तक, बड़े ऊर्जा आयातकों के लिए यह सिर्फ़ कूटनीतिक तकनीकी बात नहीं, बल्कि ईंधन की कीमतों, मुद्रास्फीति और आर्थिक स्थिरता का सीधा सवाल है।

बंदूकें, मिसाइलें और जहाज़ ही नहीं, Trump Iran ceasefire deal एक और बड़े सवाल की परीक्षा भी है—क्या वॉशिंगटन और तेहरान वर्षों की अविश्वासपूर्ण राजनीति और ध्वस्त हो चुके पिछले समझौतों के बाद परमाणु मुद्दे पर कोई टिकाऊ ढांचा बना सकते हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी मानते हैं कि ईरान अपने उच्च–समृद्ध यूरेनियम स्टॉक और उन्नत सेंट्रीफ्यूजों के ज़रिए परमाणु हथियार क्षमताओं के क़रीब पहुँच रहा है। तेहरान, इसके उलट, लगातार दावा करता है कि उसका कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और ऊर्जा व चिकित्सा जरूरतों पर केंद्रित है।

अब तक की जानकारी के अनुसार, प्रस्तावित पैकेज दो चरणों में सोचा जा रहा है—पहले चरण में युद्धविराम और होर्मुज़ पर सहमति, और उसके बाद 60 दिन की अवधि, जिसमें समृद्धि सीमा, निरीक्षण व्यवस्था और यूरेनियम स्टॉक के निपटान पर तकनीकी खाका तय किया जाएगा। विकल्पों में स्टॉक के एक हिस्से को कम–समृद्ध स्तर पर पतला करना और बचे हिस्से को किसी तीसरे देश के सुपुर्द करना शामिल है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय निगरानी में उसका प्रबंधन होगा। इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता, तथा चरणबद्ध प्रतिबंध–राहत की विश्वसनीयता पर ही वॉशिंगटन, यरूशलम और यूरोपीय राजधानियों में बैठे संदेहियों का रुख़ निर्भर करेगा।

Trump Iran ceasefire deal प्रक्रिया की एक अहम विशेषता इसमें शामिल मध्यस्थ देशों की संख्या है। पाकिस्तान ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है; उप प्रधानमंत्री इशाक डार समेत वरिष्ठ पाकिस्तानी नेताओं ने दोनों पक्षों के बीच संदेशों की आवाजाही और संभावित समझौतों की भाषा तय कराने में मदद की है। पाकिस्तानी नेतृत्व ने हाल के दौरों को “आशावाद की ठोस वजह” बताया है और कहा है कि सकारात्मक परिणाम “हाथ की पहुंच” में हैं, हालाँकि वे यह भी मानते हैं कि सभी मतभेद अभी खत्म नहीं हुए।

क़तर, ओमान और तुर्की जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ी भी सक्रिय हैं, जो एक तरफ़ तेहरान से संवाद बनाए रखते हैं और दूसरी तरफ़ क्षेत्रीय स्थिरता तथा ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। इन देशों के लिए एक टिकाऊ Trump Iran ceasefire deal का मतलब सिर्फ़ फिलहाल के संघर्ष का अंत नहीं, बल्कि लेबनान से लेकर खाड़ी तक फैले संभावित प्रॉक्सी संघर्षों की आग को ठंडा करना भी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का “जल्दबाज़ी न करने” वाला संदेश दोधारी तलवार साबित हो सकता है। एक तरफ़ यह समय देकर वार्ता–पाठ को अधिक मज़बूत और स्पष्ट बना सकता है, दूसरी तरफ़ वॉशिंगटन और तेहरान—दोनों जगह के सख़्तपंथियों को संगठित होने और प्रक्रिया को पटरी से उतारने का मौका भी देता है। अगर बातचीत विफल होती है तो अमेरिका नाकाबंदी को और कड़ा कर सकता है और नए सैन्य विकल्पों पर विचार कर सकता है, जबकि ईरान होर्मुज़ या क्षेत्रीय प्रॉक्सी मोर्चों पर दोबारा तनाव बढ़ा सकता है—यानी पूरा मध्य–पूर्व फिर से युद्ध की कगार पर पहुँच सकता है।

इसके विपरीत, अगर वार्ताकार इस अतिरिक्त समय का इस्तेमाल निगरानी तंत्र, स्पष्ट टाइमलाइन और क्षेत्रीय समर्थन को मज़बूत करने में सफल रहते हैं, तो Trump Iran ceasefire deal सिर्फ़ अस्थायी युद्धविराम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक तनाव–कमी का मॉडल बन सकती है। अंततः सब कुछ दोनों देशों की घरेलू राजनीति पर निर्भर करेगा—क्या ट्रंप रिपब्लिकन विरोध को मैनेज कर पाते हैं, और क्या ईरानी नेतृत्व यह निष्कर्ष निकालता है कि आर्थिक राहत और अंतरराष्ट्रीय अलगाव में कमी उन सीमाओं से ज़्यादा फायदेमंद है, जिन्हें उसे अपने परमाणु और क्षेत्रीय एजेंडा पर स्वीकार करनी होंगी।


Trump Iran ceasefire deal क्या है और यह इतना अहम क्यों है?

Trump Iran ceasefire deal एक प्रस्तावित समझौता है।इसके तहत युद्धविराम को आगे बढ़ाया जाएगा।होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा।ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ढाँचागत बातचीत शुरू होगी।प्रतिबंधों में राहत पर भी बातचीत होगी।इसका मकसद युद्ध को रोकना है।इससे ऊर्जा बाज़ार को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।

ट्रंप ने ईरान के साथ डील पर जल्दबाज़ी न करने की बात क्यों कही?

ट्रंप का तर्क है कि दांव बहुत ऊँचे हैं। इसलिए जल्दबाज़ी खतरनाक होगी। वे कहते हैं कि बातचीत “रचनात्मक” है। लेकिन “समय हमारे पक्ष में है”। वे मानते हैं कि समझौता बहुत सावधानी से तैयार होना चाहिए। ताकि बाद में कोई गलती ना निकले।

प्रस्तावित डील में 60 दिनों के युद्धविराम को बढ़ाने का क्या मतलब है?

रिपोर्टों के मुताबिक, 60 दिन का विस्तार मौजूदा युद्धविराम को मज़बूत करेगा।यह अमेरिका-ईरान और इज़राइल-ईरान टकराव के जोखिम को घटाएगा।इसी अवधि में होर्मुज़, प्रतिबंधों और परमाणु मसलों पर बारीक डील पर बातचीत होगी।

डील से होर्मुज़ जलडमरूमध्य और तेल की क़ीमतों पर क्या असर पड़ेगा?

अगर डील लागू होती है तो होर्मुज़ से जहाज़ों की आवाजाही धीरे–धीरे सामान्य होने की उम्मीद है, जिससे वैश्विक तेल और गैस सप्लाई पर से दबाव घटेगा और क़ीमतों में उछाल को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।

क्या Trump Iran ceasefire deal के तहत ईरान को enriched uranium छोड़ना होगा?

क्षेत्रीय अधिकारियों के अनुसार, ड्राफ़्ट में ईरान के उच्च–समृद्ध यूरेनियम स्टॉक को या तो पतला करने या किसी तीसरे देश को सौंपने जैसे विकल्पों पर चर्चा हो रही है, ताकि हथियार–स्तरीय उपयोग की संभावना कम हो सके।

कुछ रिपब्लिकन नेता इस डील का विरोध क्यों कर रहे हैं?

टेड क्रूज़ और रोजर विकर जैसे कड़े रुख़ वाले रिपब्लिकन मानते हैं कि डील बहुत नरम है, इससे ईरान का नेतृत्व मज़बूत हो सकता है और ऑपरेशन एपिक फ़्यूरी की सैन्य उपलब्धियाँ बेकार जा सकती हैं।

ईरान इस अमेरिकी प्रस्ताव पर कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है?

ईरानी अधिकारी यह मानते हैं कि प्रगति हुई है, लेकिन वे “एक–दो” अहम धाराओं पर मतभेद की बात करते हैं और कहते हैं कि सभी बिंदुओं पर नज़दीकी बढ़ने का मतलब यह नहीं कि परमाणु और प्रतिबंध–मसलों पर भी तुरंत सहमति बन जाएगी।

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